
बलरामपुर, विष्णु पांडेय। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में शारदीय नवरात्र की तैयारियां शुरू होते ही मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमाएं आकार लेने लगती हैं। इन प्रतिमाओं के पीछे एक ऐसे परिवार की मेहनत और परंपरा जुड़ी है, जिसका रामानुजगंज से करीब पांच दशक पुराना रिश्ता है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से आने वाला यह परिवार पीढ़ियों से हर साल यहां पहुंचकर मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार करता आ रहा है। पिता के बाद बेटे ने भी इसी काम को अपना लिया है। खास बात यह है कि हर साल नवरात्र से करीब एक महीने पहले यह परिवार रामानुजगंज पहुंच जाता है और यहीं रहकर प्रतिमाओं को अंतिम रूप देता है।
पिता ने शुरू किया था रामानुजगंज आने का सिलसिला
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के रहने वाले 64 वर्षीय दुर्गा दास सूत्रधार बताते हैं कि रामानुजगंज में मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने का काम उनके पिता काशीनाथ सूत्रधार ने शुरू किया था। उनके पिता पश्चिम बंगाल से यहां आकर हर साल मूर्तियां बनाया करते थे। उस समय रामानुजगंज में मध्य बाजार स्थित पीपल चौक के पास केवल एक स्थान पर मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार की जाती थी।
दुर्गा दास बताते हैं कि जब उनकी उम्र करीब 15 वर्ष हुई, तब वे भी अपने पिता के साथ रामानुजगंज आने लगे। शुरुआत में पिता के साथ रहकर मूर्ति बनाने का काम सीखा। धीरे-धीरे यही काम उनकी पहचान बन गया। आज करीब पांच दशक से वे लगातार रामानुजगंज आकर मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।
एक महीने पहले पहुंच जाते हैं रामानुजगंज
दुर्गा दास सूत्रधार के अनुसार हर साल शारदीय नवरात्र से करीब एक महीने पहले वे अपने परिवार और सहयोगियों के साथ रामानुजगंज पहुंच जाते हैं। यहां रहकर प्रतिमा निर्माण का काम पूरा करते हैं। रामानुजगंज के दो से तीन पूजा पंडालों के लिए मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने की जिम्मेदारी उनके पास रहती है।
इस काम में उनके बेटे के साथ दो से तीन अन्य कारीगर भी सहयोग करते हैं। सभी मिलकर पूरी मेहनत और लगन से प्रतिमाएं तैयार करते हैं। प्रतिमा निर्माण में मिट्टी से आकार देने से लेकर रंग भरने और सजावट तक कई चरण होते हैं। समय पर काम पूरा करने के लिए सभी कारीगर लगातार जुटे रहते हैं।
पिता के साथ बेटे ने भी संभाली जिम्मेदारी
दुर्गा दास सूत्रधार के छोटे बेटे सुमन सूत्रधार भी अब इस पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। सुमन बताते हैं कि उन्हें मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाते हुए करीब दस वर्ष हो चुके हैं। इस बार भी वे अपने पिता के साथ रामानुजगंज पहुंचे हैं और प्रतिमा निर्माण में हाथ बंटा रहे हैं।
वे बताते हैं कि फिलहाल उन्हें मूर्ति में मिट्टी लगाने और रंग भरने का काम अच्छी तरह आता है। पिता के साथ काम करते हुए उन्होंने इस कला को सीखा है और अब धीरे-धीरे प्रतिमा निर्माण के अलग-अलग कामों में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
बंगाल की कला और रामानुजगंज की आस्था का अनोखा संगम
रामानुजगंज में हर साल दुर्गा दास सूत्रधार और उनके परिवार का पहुंचना अब नवरात्र की तैयारियों का हिस्सा बन चुका है। एक तरफ स्थानीय समितियां पूजा पंडालों को सजाने में जुटती हैं, वहीं दूसरी तरफ यह परिवार मां दुर्गा की प्रतिमाओं को आकार देने में लग जाता है।
करीब पांच दशक से चला आ रहा यह सिलसिला केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती कला और परंपरा की कहानी भी है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से रामानुजगंज तक हर साल तय समय पर पहुंचना और यहां की पूजा समितियों के लिए प्रतिमाएं तैयार करना इस परिवार के लंबे जुड़ाव को दर्शाता है। पिता से शुरू हुई यह परंपरा अब बेटे तक पहुंच चुकी है।
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