
बलरामपुर, विष्णु पांडेय। जिले के रामानुजगंज वनपरिक्षेत्र में रविवार से हरा सोना कहे जाने वाले तेंदूपत्ता की खरीदी शुरू हो गई। वन परिक्षेत्र के विभिन्न ग्रामों में बनाए गए फड़ों में सुबह से ही ग्रामीण तेंदूपत्ता लेकर पहुंचने लगे। ग्राम पंचायत पुरानडीह के फड़ में पहले ही दिन करीब 40 संग्राहकों ने सीजन का पहला तेंदूपत्ता जमा किया। तेंदूपत्ता सीजन शुरू होते ही ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ गई हैं और हजारों परिवारों के लिए यह रोजगार व आजीविका का बड़ा सहारा बन गया है।
ग्रामीणों ने बताया कि तेंदूपत्ता तोड़ना आसान काम नहीं है। इसके लिए सुबह अंधेरा रहते ही परिवार के सदस्य जंगल और पहाड़ों की ओर निकल पड़ते हैं। कई किलोमीटर दूर जंगलों में पहुंचकर घंटों मेहनत करने के बाद वे तेंदूपत्ता तोड़ते हैं। इसके बाद पत्तों की गड्डियां बनाकर फड़ तक लाया जाता है। ग्रामीणों के अनुसार कई बार पूरा दिन मेहनत करने के बाद भी केवल सौ-दो सौ बंडल ही तैयार हो पाते हैं।
तेंदूपत्ता संग्रहण से ग्रामीण परिवारों को अच्छी आमदनी मिलती है। वर्तमान में तेंदूपत्ता का शासकीय दर 550 रुपए प्रति सैकड़ा निर्धारित है। यानी 100 बंडल पर 550 रुपए मिलते हैं। वहीं एक मानक बोरे की कीमत लगभग 5500 रुपए है। ग्रामीणों का कहना है कि खेती के साथ-साथ तेंदूपत्ता सीजन उनके परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाता है।
पुरानडीह फड़ के मुंशी उमेश कुमार ने बताया कि रविवार से तेंदूपत्ता खरीदी शुरू कर दी गई है। ग्रामीण संग्राहक लगातार फड़ में पत्ता जमा कर रहे हैं। विभाग से मिले दिशा-निर्देशों के अनुसार खरीदी की जा रही है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में शासकीय दर 550 रुपए सैकड़ा और 5500 रुपए प्रति मानक बोरा निर्धारित है।
ग्राम केरवाशीला निवासी प्रदीप हलदार ने बताया कि वे पिछले दस वर्षों से तेंदूपत्ता तोड़ने का कार्य कर रहे हैं। स्थानीय जंगलों में पर्याप्त पत्ता नहीं मिलने के कारण उन्हें दूरस्थ जंगलों तक जाना पड़ता है। वे अपने परिवार के साथ बछराज कुंवर सहित अन्य जंगल क्षेत्रों से तेंदूपत्ता तोड़कर पुरानडीह फड़ में जमा करते हैं। उन्होंने कहा कि तेंदूपत्ता सीजन से ग्रामीणों को अच्छी आर्थिक मदद मिलती है और यह ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण सहारा है।
वहीं रामानुजगंज रेंजर डॉ. दिलरुबा बानो ने बताया कि वन परिक्षेत्र में तेंदूपत्ता खरीदी का शुभारंभ हो चुका है। झारखंड सीमा से लगे क्षेत्र होने के कारण दूसरे राज्य से तेंदूपत्ता लाकर यहां बेचने की संभावना रहती है। इसे रोकने के लिए विभाग द्वारा विशेष निगरानी रखी जा रही है। वन परिक्षेत्र के चार सर्किलों के 12 संवेदनशील क्षेत्रों में बैरियर लगाए गए हैं, ताकि बाहरी राज्यों से लाया गया तेंदूपत्ता यहां खपाया न जा सके।
उन्होंने बताया कि तेंदूपत्ता संग्रहण ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है और शासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार खरीदी प्रक्रिया संचालित की जा रही है।
उल्लेखनीय है कि, छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता को “हरा सोना” कहा जाता है। जंगलों से तोड़े गए तेंदूपत्तों की गड्डियां बनाकर फड़ों में सुखाया जाता है। बाद में इसका उपयोग बीड़ी निर्माण में किया जाता है। हर वर्ष तेंदूपत्ता सीजन ग्रामीण अंचलों में रोजगार और आय का बड़ा माध्यम बनकर सामने आता है।
इसे भी पढ़ें……………
प्रेम संबंध पर भड़का मौसा: युवक की हत्या कर शव को फंदे पर लटकाया
