
हजारीबाग। प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक की समस्या, परीक्षा की विश्वसनीयता तथा भर्ती व्यवस्था में व्यापक सुधार पर केंद्रित डॉ. सुदीप कुमार की नई पुस्तक ‘द एग्जाम दैट कैनॉट लीक’ का 21 सितंबर को अमेजन पर प्रकाशन हुआ। पुस्तक का सांकेतिक विमोचन विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग के विभागाध्यक्ष एवं पुस्तक के मुख्य संपादक डॉ. हितेंद्र अनुपम ने किया।
पुस्तक का प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय पाठकों को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजी भाषा में किया गया है। पुस्तक वर्तमान में भारत में अमेजन किंडल ई-बुक के रूप में तथा अमेरिका सहित 13 देशों में पाठकों के लिए उपलब्ध है।
संपादकीय सहयोग में डॉ. जूही शिवानी, डॉ. अवंतिका कुमारी तथा डॉ. संदीप कुमार मिश्रा शामिल हैं। लेखकीय एवं संपादकीय टीम ने पुस्तक को परीक्षा सुधार के व्यापक विमर्श के रूप में विकसित करने का प्रयास किया है।
परीक्षा को लीक-रोधी बनाने का ‘जीरो-लीक प्रिंसिपल’
‘द एग्जाम दैट कैनॉट लीक’ में लेखक ने प्रश्नपत्र लीक की समस्या को केवल परीक्षा केंद्र या कुछ व्यक्तियों की समस्या के रूप में न देखकर पूरी परीक्षा-व्यवस्था की संरचनात्मक चुनौती के रूप में समझने का प्रयास किया है। पुस्तक का केंद्रीय विचार ‘जीरो-लीक प्रिंसिपल’ है, जिसके तीन आधार हैं—‘इलिमिनेट द अपॉर्च्युनिटी’, ‘रिड्यूस द इंसेंटिव’ और ‘चेंज द कल्चर’।
लेखक के अनुसार प्रश्नपत्र लीक की समस्या का स्थायी समाधान केवल घटना के बाद दोषियों पर कार्रवाई करने में नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा-व्यवस्था के निर्माण में है जिसमें प्रश्नपत्र तक अनधिकृत पहुंच की संभावना को शुरुआत से ही न्यूनतम किया जाए।
प्रश्नपत्र की सुरक्षा और अंतिम क्षण में उसका चयन
पुस्तक में प्रश्नपत्र की सुरक्षित संरचना, नियंत्रित पहुंच, एन्क्रिप्शन, प्रश्नों के सुरक्षित भंडारण, अंतिम समय में प्रश्नों के चयन अथवा निर्माण, रैंडमाइजेशन तथा सीमित समय के लिए अधिकृत पहुंच जैसी व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई है। इसका उद्देश्य प्रश्नपत्र की गोपनीयता को केवल कुछ व्यक्तियों की जिम्मेदारी न बनाकर पूरी परीक्षा-व्यवस्था की संरचनात्मक सुरक्षा का हिस्सा बनाना है।
केंद्रीय और राज्य स्तर पर विशेषीकृत परीक्षा एजेंसियां
पुस्तक में परीक्षा संचालन को भर्ती करने वाली संस्थाओं से अलग करने की एक द्विस्तरीय व्यवस्था की अवधारणा प्रस्तुत की गई है। इसके अंतर्गत ‘सेंट्रल स्पेशलाइज्ड एग्जामिनेशन एजेंसी’ और ‘स्टेट स्पेशलाइज्ड एग्जाम एजेंसी’ जैसी विशेषीकृत संस्थाओं की परिकल्पना की गई है।
इन एजेंसियों का मुख्य कार्य केवल परीक्षा संचालन और मूल्यांकन तक सीमित होगा। भर्ती, पदों का निर्धारण अथवा अंतिम प्रशासनिक निर्णय इनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा नहीं होगा। इस प्रकार परीक्षा आयोजित करने, प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा संचालन तथा मूल्यांकन की प्रक्रिया को एक विशेषीकृत और स्वतंत्र संस्थागत व्यवस्था के अंतर्गत रखने की संभावना पर पुस्तक में विचार किया गया है।
सरल, एकीकृत और समझने योग्य परीक्षा व्यवस्था
पुस्तक में प्रतियोगी परीक्षाओं को अनावश्यक रूप से जटिल बनाने के बजाय सरल और एकीकृत स्वरूप देने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। लेखक ने ऐसी व्यवस्था की कल्पना की है जिसमें अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं की अत्यधिक विविधता और अनावश्यक प्रक्रियात्मक जटिलता को कम करते हुए अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा प्रणाली को अधिक स्पष्ट, तार्किक और समझने योग्य बनाया जा सके।
आवश्यकतानुसार चार स्तरीय परीक्षा प्रणाली
पुस्तक में सभी पदों के लिए एक जैसी परीक्षा प्रणाली लागू करने के बजाय पद की प्रकृति, जिम्मेदारी और अभ्यर्थियों की संख्या के अनुसार चरणों का निर्धारण करने की अवधारणा पर चर्चा की गई है। आवश्यकता के अनुसार परीक्षा व्यवस्था में अधिकतम चार स्तरों का उपयोग किया जा सकता है—प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा, समूह चर्चा अथवा व्यावहारिक/विशेषज्ञ मूल्यांकन तथा साक्षात्कार।
इसका उद्देश्य प्रत्येक पद के लिए उसकी वास्तविक कार्य-प्रकृति के अनुरूप अभ्यर्थियों की क्षमता का मूल्यांकन करना है, न कि केवल एक लिखित परीक्षा के आधार पर चयन करना।
एकीकृत विशेषज्ञ मूल्यांकन से निष्पक्षता की ओर
पुस्तक में मूल्यांकन व्यवस्था को अधिक विशेषज्ञतापूर्ण और एकीकृत बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई है। विशेषज्ञ मूल्यांकन प्रणाली में अभ्यर्थियों की पहचान को यथासंभव मूल्यांकन प्रक्रिया से अलग रखते हुए निर्धारित मानकों के आधार पर मूल्यांकन करने की व्यवस्था पर विचार किया गया है।
साक्षात्कार के स्तर पर भी विशेषज्ञ पैनल, यादृच्छिक रूप से साक्षात्कार बोर्ड का गठन तथा मूल्यांकन के लिए स्पष्ट मानदंड जैसी व्यवस्थाओं की चर्चा की गई है।
असफलता को उपलब्धि में बदलने की ‘अचीवमेंट कार्ड’ अवधारणा
पुस्तक की एक महत्वपूर्ण अवधारणा ‘अचीवमेंट कार्ड’ है। लेखक ने यह प्रश्न उठाया है कि सीमित सरकारी रिक्तियों के कारण परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद चयन से बाहर रह जाने वाले सक्षम अभ्यर्थियों की उपलब्धियों का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है।
‘अचीवमेंट कार्ड’ के माध्यम से परीक्षा में अभ्यर्थी द्वारा प्रदर्शित ज्ञान, कौशल, क्षमता और उपलब्धि का एक प्रमाणित रिकॉर्ड तैयार करने की संभावना पर विचार किया गया है। इसका उपयोग सरकारी नौकरी के चयन के अतिरिक्त निजी क्षेत्र में रोजगार, कौशल विकास, प्रशिक्षण, उद्यमिता तथा अन्य कार्यों के वैकल्पिक अवसरों से जोड़ने के लिए किया जा सकता है।
सीमित अवसर, लेकिन सुनिश्चित अवसरों की दिशा में प्रयास
पुस्तक में यह विचार भी प्रस्तुत किया गया है कि सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित होने के कारण प्रत्येक योग्य अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है। इसलिए परीक्षा व्यवस्था को केवल चयन और असफलता के द्विआधारी परिणाम तक सीमित रखने के बजाय ऐसे वैकल्पिक अवसरों की संरचना आवश्यक है, जिनके माध्यम से परीक्षा में प्रदर्शित क्षमता आगे किसी अन्य अवसर में परिवर्तित हो सके।
इस संदर्भ में पुस्तक सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र, कौशल विकास, प्रशिक्षण, उद्यमिता और अन्य रोजगार अवसरों के बीच बेहतर संस्थागत संबंध विकसित करने की संभावना पर चर्चा करती है।
निजी क्षेत्र में योग्य मानव संसाधन के लिए बेहतर अवसर
पुस्तक में यह विचार भी रखा गया है कि यदि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल न होने वाले सक्षम अभ्यर्थियों की उपलब्धियों को प्रमाणित और व्यवस्थित तरीके से निजी क्षेत्र तक पहुंचाया जाए, तो सरकारी नौकरी के बाहर भी उनके लिए नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
इसके साथ ही निजी क्षेत्र में कार्यरत योग्य कर्मियों के लिए नियमबद्ध सुविधाओं, प्रशिक्षण, कौशल उन्नयन और कार्यस्थल से संबंधित अवसरों में वृद्धि की आवश्यकता पर भी विचार किया गया है। इसका व्यापक उद्देश्य रोजगार को केवल सरकारी पदों तक सीमित न रखते हुए एक सक्षम और उत्पादक कार्यबल का निर्माण करना है।
कार्यक्षम मानव संसाधन के विकास की दिशा में परीक्षा सुधार
पुस्तक में परीक्षा सुधार को केवल भर्ती प्रक्रिया की समस्या नहीं माना गया है। लेखक ने इसे कार्यक्षम मानव संसाधन के विकास से जोड़ने का प्रयास किया है। ऐसी परीक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पर विचार किया गया है जो केवल परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों की पहचान न करे, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के लिए उपयुक्त ज्ञान, कौशल, निर्णय क्षमता, संचार क्षमता और व्यावहारिक दक्षता वाले मानव संसाधन की पहचान और विकास में भी सहायक हो।
तकनीक आधारित परीक्षा और नियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप
पुस्तक में कंप्यूटर-बेस्ड टेस्टिंग, सुरक्षित डिजिटल प्रक्रियाओं, प्रश्नों के रैंडमाइजेशन, नियंत्रित अभिगम तथा पहचान-रहित मूल्यांकन जैसे तकनीकी उपायों पर भी चर्चा की गई है। लेखक का मानना है कि तकनीक का उद्देश्य मानव को पूरी तरह हटाना नहीं, बल्कि उन स्थानों पर मानवीय हस्तक्षेप को नियंत्रित करना है जहां उससे परीक्षा की निष्पक्षता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
वैश्विक संदर्भ में परीक्षा सुधार
पुस्तक का दृष्टिकोण किसी एक देश या एक भर्ती संस्था तक सीमित नहीं है। इसमें वैश्विक संदर्भ में परीक्षा सुरक्षा, भर्ती व्यवस्था, तकनीकी हस्तक्षेप, प्रश्नपत्र की गोपनीयता, मूल्यांकन प्रणाली और सार्वजनिक रोजगार से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है।
लेखक ने ऐसी परीक्षा-सुरक्षा अवधारणाओं पर भी चर्चा की है, जिन पर विभिन्न देश अपने-अपने कानूनी, सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भों के अनुरूप भविष्य में विचार कर सकते हैं।
पुस्तक की कहानी, लेखक की जुबानी
डॉ. सुदीप कुमार के अनुसार, पुस्तक का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार विशेष पर आरोप लगाना नहीं है। पुस्तक को विवादमुक्त एवं सुधारोन्मुख स्वरूप में रखा गया है, ताकि परीक्षा प्रणाली की कमजोरियों पर चर्चा करते हुए संभावित समाधान और वैकल्पिक संस्थागत व्यवस्थाओं पर विचार किया जा सके।
लेखक का मानना है कि विश्व के अनेक देशों में प्रतियोगी और सार्वजनिक परीक्षाएं लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी हैं। इसलिए परीक्षा की विश्वसनीयता केवल अभ्यर्थियों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रशासन, सरकार और समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि परीक्षा प्रणाली अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और योग्यता-आधारित बनती है, तो इससे भर्ती प्रक्रिया में विश्वास बढ़ाने और भविष्य में बेहतर प्रशासनिक संस्थाओं के निर्माण में योगदान मिल सकता है।
पारिवारिक एवं अकादमिक सहयोग के प्रति आभार
पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर डॉ. सुदीप कुमार ने अपनी पत्नी अपराजिता सहित अपने परिवार के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। अपराजिता डी.ए.वी. स्कूल, हजारीबाग में शिक्षिका हैं और पुस्तक के लेखन के दौरान उन्होंने निरंतर सहयोग और प्रोत्साहन दिया। लेखक ने कहा कि लंबे समय तक किसी पुस्तक पर कार्य करना केवल लेखक का प्रयास नहीं होता, बल्कि परिवार के धैर्य, सहयोग और समझ की भी उसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
लेखक ने अपने शोध मार्गदर्शक एवं मुख्य संपादक डॉ. हितेंद्र अनुपम तथा अन्य संपादकों और शिक्षकों के प्रति भी आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पुस्तक को अंतिम रूप देने में अकादमिक मार्गदर्शन, संपादकीय सुझाव और पारिवारिक सहयोग का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

‘द एग्जाम दैट कैनॉट लीक’ के माध्यम से लेखक ने परीक्षा सुधार को केवल एक प्रशासनिक विषय न मानकर शिक्षा, रोजगार, प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक विश्वास से जुड़े व्यापक विषय के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी व्यवस्था की आलोचना मात्र करना नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा प्रणाली पर विचार को आगे बढ़ाना है जिसमें निष्पक्षता और सुरक्षा को प्रक्रिया के बाद जोड़ा न जाए, बल्कि शुरुआत से ही परीक्षा-व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
लेखक परिचय
पुस्तक के लेखक डॉ. सुदीप कुमार वर्तमान में झारखंड सचिवालय सेवा में प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं तथा जल संसाधन विभाग, हजारीबाग में पदस्थापित हैं। इससे पूर्व वे बिहार सरकार में नगर कार्यपालक पदाधिकारी के रूप में कार्य कर चुके हैं। उनका चयन बिहार लोक सेवा आयोग की 56वीं–59वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा के माध्यम से हुआ था।
डॉ. कुमार ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के बाद विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग से इतिहास विषय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उनका शोध प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में किसानों एवं कारीगरों की स्थिति से संबंधित रहा है। वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के आजीवन सदस्य भी हैं। उनकी पूर्व प्रकाशित पुस्तक ‘पीजेंट्स एंड आर्टिजन्स: लाइफ इन द अर्ली मीडीवल वर्ल्ड (800–1200 ए.डी.)’ भी इतिहास और सामान्य जनजीवन से जुड़े विषय पर केंद्रित रही है।
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