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    Home»Politics»‘शांति, विश्वास, आस’ सब टूटी, अब शिखर पर बैठकर ‘संजय’ से पार्टी में महाभारत का हाल सुनेंगे केजरीवाल
    Politics

    ‘शांति, विश्वास, आस’ सब टूटी, अब शिखर पर बैठकर ‘संजय’ से पार्टी में महाभारत का हाल सुनेंगे केजरीवाल

    Offbeat NewsBy Offbeat NewsApril 24, 2026
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    नई दिल्ली। 2012 में बनी आम आदमी पार्टी (आप) के नाव से ऐसे तो सवार लगातार उतरते रहे हैं। लेकिन, 2026 के अप्रैल महीने की 24 तारीख को जिस सियासी भंवर में पार्टी की नाव फंसी उसने तो पूरी पार्टी की ही जड़ें हिलाकर रख दी। पार्टी के तीन राज्यसभा सांसदों ने मीडिया के सामने आकर पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी और भाजपा में शामिल हो गए।

    इसके साथ ही पार्टी के तीनों सांसद इसका दावा भी कर गए कि 4 अन्य सांसद पार्टी से निकलने को तैयार है। इसके बाद तो राजनीतिक हलके में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया कि आखिर इस नई नवेली पार्टी का जितनी तेजी से उदय हुआ उसका ग्राफ इतनी तेजी से नीचे गिरने की वजह क्या है? अब तो पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी यह डर सताने लगा है कि अब शिखर पर बैठकर ‘संजय’ से पार्टी में महाभारत का हाल अरविंद केजरीवाल को सुनना पड़ेगा।

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    दरअसल, 2011 में केंद्र में सत्ता विरोधी लहर से जूझ रही कांग्रेस के नेतृत्व वाली (यूपीए) के खिलाफ रामलीला मैदान से एक जनआंदोलन की शुरुआत हुई। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी अन्ना हजारे, 5 अप्रैल 2011 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए थे। अन्ना हजारे के चेहरे को सामने रखकर अरविंद केजरीवाल इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे और उनके साथ मंच पर किरण बेदी, कुमार विश्वास, योगेंद्र यादव, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, जनरल वीके सिंह, स्वामी अग्निवेश जैसे कई चर्चित चेहरे नजर आने लगे। जनता का भी इस आंदोलन के मंच से तैयार हो रहे नेताओं पर विश्वास बढ़ रहा था और लग रहा था कि देश अब बदलाव के मूड में है।

    अन्ना की टीम उस समय यूपीए सरकार से मांग कर रही थी कि देश में लोकपाल समिति का गठन सरकार ने आंदोलन को तीव्र होते देख किया तो आमरण पर बैठे अन्ना की शर्तों को माना और इस पर विचार करने के लिए संसद से सड़क तक लोकपाल बिल को लेकर खूब बहस हुई। लेकिन जब सरकार ने अन्ना हजारे द्वारा की गई कोई भी मांग नहीं सुनी तो इसके बाद अन्ना को दोबारा 16 अगस्त 2011 को फिर से आमरण अनशन पर बैठना पड़ा। जिसको इस बार देश की जनता का इतना समर्थन मिला कि लोगों को लोहिया की क्रांति की याद हो आई। 12 दिन तक दिल्ली के रामलीला मैदान में दो लाख के करीब लोग हर रोज आते रहे। जिसके कारण सरकार ने दोबारा नए सिरे से जन लोकपाल लाने का वायदा किया है। ये वायदा भी पूरा नहीं हुआ और फिर से जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू हो गया।

    हालांकि तब भी इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई तो अन्ना हजारे ने राजनीति में उतरकर कीचड़ साफ करने का आह्वान कर दिया। लेकिन जब पार्टी बनाने की बात आई तो अन्ना ने पार्टी में शामिल होने से यह कह कर इनकार कर दिया कि राजनीति तो कीचड़ है।

    इधर, अरविंद केजरीवाल अब अन्ना की जगह आमरण अनशन पर थे और मंच से अन्ना गायब थे। फिर 2 अगस्त 2012 की शाम को अरविंद केजरीवाल और उनके दोस्तों ने ‘भूख हड़ताल’ के दौरान सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक राजनीतिक रूप लेगा, जिसमें एक राजनीतिक दल का गठन करना और चुनाव लड़ना शामिल होगा। 26 नवम्बर 2012 को अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में ‘आम आदमी पार्टी’ बनाई गई। फिर दिसंबर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस नई नवेली पार्टी ने अपना दमखम दिखाया और आम आदमी पार्टी को 70 में से 28 सीटों पर जीत मिली। परिणामस्वरूप कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी का समर्थन करना पड़ा और अरविंद केजरीवाल ने 28 दिसम्बर 2013 को उसी रामलीला मैदान जहां से आंदोलन शुरू की थी मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

    आम आदमी पार्टी का जन्म भ्रष्टाचार के खिलाफ चले एक बड़े जनांदोलन के बाद हुआ। जनता ने अन्य राजनीतिक पार्टियों की तुलना में आम आदमी पार्टी को एक स्वच्छ राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा। ‘आप’ को जो भी सफलता मिलनी शुरू हुई थी, वह परंपरागत राजनीति के खिलाफ जनता के मन में पल रहे असंतोष के कारण संभव हो पाया था। लेकिन, धीरे-धीरे जनता को आम आदमी पार्टी का आचरण उसी राजनीति जैसा नजर आने लगा जिसके विरोध में यह खड़ी हुई थी।

    अब जब पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने की खबर आई तो ऐसा लगा मानो आम आदमी पार्टी में भूचाल मच गया हो। शुक्रवार को आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने दो अन्य सांसदों संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ पार्टी छोड़ने और भाजपा में शामिल होने का ऐलान किया तो यह आप के लिए सियासी सुनामी से कम नहीं था।

    राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने तो पार्टी छोड़ने के फैसले के बारे में बताते हुए आम आदमी पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि आप अपने मूल सिद्धांतों से पूरी तरह भटक गई है। जिस आप को मैंने 15 सालों तक अपने खून से सींचा, वह अपने मार्ग से भटक गई है। अब यह देशहित के लिए नहीं बल्कि अपने निजी फायदों के लिए काम कर रही है। राघव चड्ढा ने आगे जो कहा वह आम आदमी पार्टी के नेताओं की नींद उड़ाने के लिए काफी था, उन्होंने कह दिया कि राज्यसभा में आप के 10 सांसद हैं और दो-तिहाई से ज्यादा सांसद इस मुहिम में हमारे साथ हैं। उन्होंने पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं और सुबह हमने सभी जरूरी दस्तावेज, जिनमें हस्ताक्षरित पत्र और अन्य औपचारिक कागजात शामिल हैं, राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं। राघव ने इसके साथ ही विश्व-स्तरीय क्रिकेटर हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल के भी इस मुहिम में शामिल होने की बात कह दी।

    हालांकि, यह आप के लिए पहली बार असहज होने जैसी स्थिति नहीं थी। सबसे पहले आप के संस्थापक सदस्य योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और शाजिया इल्मी ने पार्टी से नाता तोड़ा था। इसके बाद पार्टी के गंभीर चेहरों में से एक प्रो. आनंद कुमार पार्टी के कामकाज के तरीके से असहमत नजर आए थे और उन्होंने भी पार्टी से दूरी बना ली थी। इसी तरह पार्टी के पूर्व विधायक विनोद बिन्नी और पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने भी आप से बगावत करते हुए पार्टी छोड़ दी थी। कपिल मिश्रा ने तो केजरीवाल पर सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपए लेने का आरोप लगा दिया था। दूसरी तरफ पार्टी छोड़ने वाले बिन्नी तो तब से अरविंद केजरीवाल के साथ थे जब अन्ना आंदोलन शुरू भी नहीं हुआ था।

    आम आदमी पार्टी के एक और संस्थापक सदस्य कुमार विश्वास का केजरीवाल से मतभेद भी किसी से छुपा नहीं था। पार्टी ने उन्हें पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार न करने को कहा था। उन्हें पंचायती राज पार्टी (पीएसी) से हटा दिया गया और राजस्थान विधानसभा प्रभारी का पद भी छीन लिया गया। बाद में उन्हें पीएसी में वापस लाया गया, लेकिन दोनों के बीच तनाव कम नहीं हुआ। उनके साथ पार्टी की बैठक में दुर्व्यवहार की खबरें भी आई और फिर उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी।

    आम आदमी पार्टी ने वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्‍याय को पार्टी के खिलाफ काम करने के आरोप में बर्खास्त कर दिया और फिर वह भी पार्टी से अलग हो गए थे। वहीं दूसरी तरफ अन्ना आंदोलन के समय से जुड़ी किरण बेदी ने भी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और भाजपा में शामिल हो गई थीं। उनके चेहरे पर भाजपा ने दिल्ली में विधानसभा चुनाव भी लड़ा था।

    2015 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद आम आदमी पार्टी के दो बड़े चेहरों योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से निकाल दिया गया। तब दोनों ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी का मुद्दा उठाया था। दोनों को इसके बाद पार्टी से बाहर निकाल फेंका गया। प्रशांत भूषण के पिता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने आप की स्थापना के समय एक करोड़ की राशि चंदे के रूप में दी थी। हालांकि जल्द ही उनका पार्टी से मोहभंग हो गया था और वह भी आम आदमी पार्टी से अलग हो गए थे।

    पत्रकार से राजनेता बने आशुतोष ने भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मतभेदों के चलते पार्टी छोड़ दी थी। आशुतोष तो केजरीवाल के सबसे विश्वसनीय सहयोगियों में से एक थे। हालांकि उन्होंने 15 अगस्त को निजी कारणों का हवाला देते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। आम आदमी पार्टी की संस्थापक सदस्यों में से एक मधु भादुरी ने भी पार्टी के कामकाज के तरीके से निराश होकर पार्टी छोड़ दी थी। उन्होंने महिला पार्टी नेताओं के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए पार्टी से इस्तीफा दिया था। इसके साथ ही प्रो. आनंद कुमार जो शुरुआती दिनों से टीम केजरीवाल का हिस्सा रहे थे पार्टी में एक व्यक्ति एक पद की मांग उठा रहे थे। ऐसे में उन्हें भी पार्टी से किनारा कर दिया गया। शाजिया इल्मी तो पत्रकारिता छोड़ अन्ना आंदोलन से जुड़ी थीं, उन्होंने भी अरविंद केजरीवाल पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी थी।

    इसके साथ ही आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक मयंक गांधी, जो आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी थे, ने केजरीवाल के साथ मतभेदों के कारण 2015 में पार्टी छोड़ दी। पत्रकार से राजनेता बने और पार्टी से जुड़े आशीष खेतान ने निजी कारणों का हवाला देकर पार्टी छोड़ दी थी। इसके साथ ही भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अंजलि दमानिया, जो महाराष्ट्र में आम आदमी पार्टी की चेहरा थीं, ने मार्च 2015 में, केजरीवाल के साथ मतभेदों के चलते कथित तौर पर पार्टी से नाता तोड़ लिया था। वहीं पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के एक और नेता सुभाष वारे ने अक्टूबर 2015 में राष्ट्रीय कार्यकारिणी और आम आदमी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

    इसके साथ ही अजीत झा, कैप्टन जीआर गोपीनाथ, अशोक अग्रवाल, मौलाना काज़मी, एमएस धीर, एसपी उदयकुमार और अलका लांबा समेत कई चेहरे पार्टी के कामकाज से नाखुश होकर बागी हुए और उन्होंने अपना अलग रास्ता ढूंढ लिया।

    अब आम आदमी पार्टी के सांसदों में संजय सिंह, एनडी गुप्ता, बलबीर सिंह सीचेवाला ही शेष रह गए हैं। ऐसे में अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी के तौर पर संजय सिंह ही हैं, जिन पर केजरीवाल का भरोसा है और पार्टी की सोच को वह मुखरता के साथ संसद में रखते हैं। अब ऐसे में आम आदमी पार्टी का क्या होगा, यह विचारणीय प्रश्न है। क्योंकि पार्टी के गठन से लेकर अब तक ‘शांति, विश्वास, आस’ सब टूटी, ऐसे में आम आदमी पार्टी के संयोजक अब शिखर पर बैठकर ‘संजय’ से पार्टी में महाभारत का हाल सुनेंगे।

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