
हजारीबाग, डॉ. अमरनाथ पाठक। शिवदयाल बाबू इस युग के महामानव थे। उनका जाना शिक्षा जगत और समाज के एक अनमोल सितारे का अस्त हो जाना है। अब उनकी मधुर स्मृतियां ही शेष हैं। मूर्धन्य विद्वान और महामानव प्रोफेसर डाॅ शिवदयाल सिंह का निधन शिक्षा जगत और समाज के लिए अपूरणीय क्षति…कभी न भरनेवाला, शून्य कर चले गए …बेहद दुखद समाचार, विनम्र श्रद्धाँजलि….नब्बे के दशक की बात है। मैं गर्मी के दिन चिलचिलाती धूप में मार्खम कॉलेज से पैदल ओकनी घर आ रहा था। टावर के पास अचानक एक कार आकर रूक गई, खुद गाड़ी चलाते हुए शिवदयाल बाबू ने आवाज लगाई, ए अमरनाथ बाबू कहां जा रहे हैं, बैठिए…पैगोडा चौक से न्यू एरिया फिर ओकनी भी घुसना चाह रहे थे, मैंने रोक दिया और हाथ जोड़ लिया…वहां तक छोड़ दिया। न तनिक गुमान, न कड़क जुबान, शिवदयाल बाबू की अपनी एक अलग पहचान है…, सदैव रहेगी…एक बार घर गए तो बेल को शर्बत पिलाकर ही दम लिए, चाची यानी सुबोध भैया की मां के इंतकाल पर गए थे, तब भी शिवदयाल सर कहानी सुनाते रहते थे…ऐसे महान आत्मा से कई मधुर यादें हमेशा जुड़ी रहेंगी….
वरिष्ठ पत्रकार मुरारी सिंह ने शोक संवेदना में अपने फेसबुक वाल पर लिखा…. शिवदयाल सिंहजी उर्फ घर के “बापू” का जाना। (संत कोलंबा कॉलेज के पूर्व शिक्षक, मार्खम कॉलेज के प्राचार्य) सुबोध भैया और हमको अपने मित्र मंडली के साथ तीन दिन के भ्रमण पर निकलना था। हमलोग को बस पकड़ने के गवर्नमेंट गर्ल स्कूल के पास एकत्रित होना था। सुबोध भैया ने कह दिया ‘घर पहुंचिए, साथ निकलेंगे।’ बाइक से सुबोध भैया के घर पहुंचा।
निकलते समय आदतन सुबोध भैया ने बापू का पैर छुआ। मैने भी अनुसरण किया। आशीष के साथ दोनो को 500-500 रुपए उन्होंने मोड कर दिया। सुबोध भैया का इशारा। रख लीजिए। सुबोध भैया के पुत्र राजन ने हम दोनों को बस तक पहुंचाया। रास्ते में सुबोध भैया ने बताया कि जब भी कहीं जाते हैं बापू उनको कुछ रुपए जरूर देते हैं। वो रुपए सुबोध भैया की जरूरत नहीं थी। जरूरत रहती थी आशीष की जो उन्हें खुश रहिए के आशीर्वाद के साथ उससे जुड़ी उनकी परंपरा का मिलता था।

शिवदयाल बाबू के पिता चंद्र नारायण सिंह का भी निधन 93 वर्ष की अवस्था में हुआ था। इनका भी निधन 93 साल में बुधवार की सुबह चलते फिरते, आशीर्वाद देते हो गया। इनके परपोता को परदादा की गोद में खेलने का अवसर मिला। सब से मिलते जुलते अनंत यात्रा पर प्रस्थान किया। इनके जाने का सबसे ज्याद पीड़ा उनके पोते रोशन को है। दिन भर उनके साथ रहना। बोलना, बतियाना। जब जरूरत पड़े “बाबा बैंक” के एटीएम से छोटी रकम निकलवा लेना और उसे खर्च करना। अंतिम संस्कार कल होगा।

विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग पीजी राजनीति विज्ञान विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर डाॅ प्रमोद कुमार के संस्मरण में शिवदयाल सर…. अफसोस! जिन्होंने मुझे रोटी दी, उन्हें मैं अंतिम समय में जल भी न दे सका…..
संदर्भ गुरुदेव प्रोफेसर शिवदयाल सिंह जी का इस दुनिया से परलोक गमन…. आज सुबह जब मैं अपने गांव में टहल रहा था इस समय खबर मिली कि गुरुदेव शिवदयाल बाबू नहीं रहे। पत्रकार भाई मुरारी जी का पहले फोन आया। मैं थोड़ी देर के लिए स्तब्ध रह गया। मेरी स्मृतियों पिछले 40 वर्षों की सामने एक-एक करके आने लगी। शिवदयाल बाबू न सिर्फ शिक्षा जगत के उच्चतम स्तंभ थे, बल्कि एक सफल शिक्षक के रूप में उनकी पहचान है।

आर्थिक संसाधनों को झेलते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी कर सबसे पहले हिंदू स्कूल में शिक्षक बने। इसके बाद संत कोलंबा कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 1974 ईस्वी में मार्खम कॉलेज आफ काॅमर्स की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। बल्कि यह कहा जाए कि वह मार्खम कॉलेज के नींव की पहली ईंट थे।
मात्र ₹11 36 पैसे से इस कॉलेज की शुरुआत उन्होंने की थी और यह कॉलेज आज विनोबा भावे विश्वविद्यालय का सिरमौर कॉलेज बना हुआ है। शिक्षा जगत की कई ऊंचाइयों को स्पर्श करते हुए उन्होंने जेजे कॉलेज झुमरी तिलैया और चतरा कालेज चतरा के प्राचार्य पद पर लंबे समय तक रहे। अवकाश प्राप्त करने के बाद वे घर पर कभी भी बैठे नहीं रहे, बल्कि सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते रहे। मार्खम कॉलेज में राजनीति विज्ञान के पद पर उन्होंने मुझे नियुक्त किया और कहा था कि शिक्षक का पैसा सबसे अच्छा होता है, इसलिए एक सफल शिक्षक बने।

जब मैं 2000 ईस्वी में पत्रकारिता जगत से जुड़ा तो उनसे इतिहास और संस्कृति की जानकारी मुझे हमेशा मिलती रही और वह मेरा हौसला अफजाई करते रहते थे। फादर कामिल बुल्के और आचार्य बद्री नाथ शास्त्री के बारे में मुझे एक से एक जानकारी देकर पत्रकारिता जगत में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सिर्फ हजारीबाग में ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड में हुए हिंदी जगत के चमकता हुआ ध्रुव तारा थे, जिसके प्रकाश में हजारों विद्यार्थी आज अपना सफल जीवन जी रहे हैं।
वह दिन भी मुझे याद है जब मेरे अनुरोध पर उन्होंने रामनारायण डिग्री कॉलेज हंटरगंज में अतिथि बनकर आना स्वीकार किया था। मेरा उनसे पारिवारिक रिश्ता तो है ही लेकिन गुरु शिष्य का जो संबंध था उसके बारे में कुछ लिखूं, तो शब्द भी कम पड़ जाएंगे।

मैं आज कुछ ऐसी बात लिख रहा हूं जिसे आज तक किसी भी व्यक्ति को नहीं बताया था। जब मेरी शादी तय हुई तो उन्होंने अगुवाई की और मैं जब अनुपस्थित था, तो छेका का पन फुल मेरे छोटे भाई के हाथ में देकर इस पवित्र काम को अंजाम दिया था।

उनके निधन से कुछ ही दिन पहले मैं सर के आवास पर जाकर अपने दादाजी की लिखित पुस्तक स्वराज लुट गया हाथों में देखकर तस्वीर खिंचवाने का अनुरोध किया था। उनसे यह भी कहा था कि सर आप सिर्फ धोती में हैं ऊपर से कुर्ता पहन लीजिए।

उन्होंने मजाक में कहा था कि जब पूरा स्वराज ही लूट गया, तो यह समझ लीजिए कि मेरा कुर्ता भी लुट गया…… सर के निधन से मैं न सिर्फ एक अभिभावक को खो दिया है, बल्कि उनके निधन से मैं एक सांस्कृतिक और सामाजिक और बौद्धिक अभिभावक से वंचित हो गया हूं। वह एक जीवित एनसाइक्लोपीडिया थे, जिनके पैन आज हमेशा हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। विनम्र श्रद्धांजलि…
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