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    Home»Education»एक्सआईएसएस में नवनिर्मित डॉ कुमार सुरेश सिंह ट्राइबल रिसोर्स सेंटर का उद्घाटन 16 को, मुख्यमंत्री करेंगे अनावरण
    Education

    एक्सआईएसएस में नवनिर्मित डॉ कुमार सुरेश सिंह ट्राइबल रिसोर्स सेंटर का उद्घाटन 16 को, मुख्यमंत्री करेंगे अनावरण

    Offbeat NewsBy Offbeat NewsNovember 14, 2022Updated:November 14, 2022
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    रांची (विष्णु पांडेय)। ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान ने (एक्सआईएसएस) स्थित फादर माइकल अल्बर्ट विंडी एसजे मेमोरियल लाइब्रेरी में 16 नवंबर बुधवार को होने वाले डॉ कुमार सुरेश सिंह ट्राइबल रिसोर्स सेंटर के उद्घाटन के लिए रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि, हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री, झारखंड के साथ सम्मानित अतिथि, डॉ रामेश्वर उरांव, वित्त मंत्री, झारखण्ड सरकार, और डॉ महुआ माजी, सांसद, राज्य सभा शामिल होंगे। कार्यक्रम के दौरान डॉ सिंह की पत्नी, बिमलेश्वरी देवी और उनके पुत्र, ध्रुव सिंह और उनका परिवार भी उपस्थित रहेगा। यह कार्यक्रम 16 नवंबर को संस्थान के फादर माइकल अल्बर्ट विंडी एसजे मेमोरियल लाइब्रेरी में आयोजित होगी, तत्पश्चात फादर माइकल वान डेन बोगर्ट एसजे मेमोरियल ऑडिटोरियम में एक कार्यक्रम भी होगा। एक्सआईएसएस के निदेशक डॉ जोसेफ मारियानुस कुजूर एसजे ने सम्मेलन में कहा, “आज हम यहां डॉ कुमार सुरेश सिंह को शिक्षा, नीति निर्माण और कानून बनाने में उनके योगदान के लिए मान्यता देने के प्रयास के रूप में एकत्र हुए हैं। इस रिसोर्स सेंटर का मुख्य उद्देश्य न केवल किताबों को उपलब्ध करना है, बल्कि दुर्लभ पांडुलिपियों के संग्रहों को भी आम लोगों के बीच उपलब्ध कराना है, जिससे हम उनकी यादों को जीवित रखेंगे।”

    डॉ अमर ई. तिग्गा, डीन एकेडमिक्स, एक्सआईएसएस ने कहा, “आदिवासी समाज के लिए काम करना एक्सआईएसएस के दिल में है जो हमारे संस्थापकों के विज़न के अनुरूप है। इस रिसोर्स सेंटर के जरिए हम चाहते हैं कि एक्सआईएसएस पूरी दुनिया के लिए एक ज्ञान केंद्र बने।”
    एक्सआईएसएस के ग्रामीण प्रबंधन कार्यक्रम के प्रमुख डॉ अनंत कुमार ने कहा, “डॉ कुमार सुरेश सिंह को न केवल एक विद्वान बल्कि खुद एक संस्थान के रूप में वर्णित किया जाना ही उपयुक्त है। यह रिसोर्स सेंटर न केवल उनकी आदिवासी समाज में केंद्रित पढ़ाई की जानकारी देगा बल्कि उनके काम को उजागर करने और बढ़ावा देने में भी सहयोग देग।”
    इस रिसोर्स सेंटर का उपयोग स्थानीय विद्वानों के साथ-साथ दुनिया भर के स्कॉलर्स भी मेम्बरशिप के माध्यम से ले सकेंगे। आदिवासी उद्यमिता के लिए यह एक महत्वपूर्ण संसाधन होगा क्योंकि आदिवासी अर्थव्यवस्था, आदिवासी कृषि, और आजीविका पर डॉ कुमार सुरेश सिंह की अंतर्दृष्टि आधुनिक समय के लिए भी प्रेरणादायक है। डॉ कुमार सुरेश सिंह – एक भारतीय विद्वान एवं प्रशासक

    प्रोफ़ाइल:
    नाम – डॉ कुमार सुरेश सिंह आईएएस
    स्नातक – इतिहास में प्रथम श्रेणी ; मास्टर डिग्री – पटना विश्वविद्यालय पीएच.डी. – ‘अ स्टडी ऑफ बिरसा मुंडा एंड हिज मूवमेंट इन छोटानागपुर 1874-1901’ पर, पटना विश्वविद्यालय से प्रारंभिक करियर – उन्होंने 1956 में इंडियन स्कूल ऑफ माइन्स, धनबाद में मानविकी विभाग में व्याख्याता के रूप में अपना करियर शुरू किया।

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    डॉ कुमार सुरेश सिंह का जीवन और कार्य (1933-2006):
    डॉ कुमार सुरेश सिंह प्रशासक से लेकर ऐतिहासिक नृवंशविज्ञानी तक, एक बहुमुखी विद्वान थे। जनजातीय मामलों पर अन्वेषण के लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने आदिवासी आंदोलन, कृषि संबंध, आदिवासी प्रथागत कानून, आदिवासी अर्थव्यवस्था, आदिवासी महिलाओं, आदि जैसे प्रासंगिक आदिवासी विषयों पर कई अकादमिक पत्र प्रकाशित किए। उन्होंने अपने ऐतिहासिक अध्ययन में ऐतिहासिक अनुसंधान और मानवशास्त्रीय क्षेत्र कार्य की एक संयुक्त पद्धति को अपनाया। एक सामाजिक इतिहासकार के लिए वह आदिवासी समाज और संस्कृति के अध्ययन की आवश्यकता लेकर आए। एक सामाजिक मानवविज्ञानी के लिए उनके शोधों द्वारा व्यक्त विचार समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में जनजातीय समाज का अध्ययन करना था। उनका मानना ​​​​था कि भारत में सामाजिक इतिहास के बिना कोई सामाजिक नृविज्ञान नहीं हो सकता है और सामाजिक नृविज्ञान के बिना कोई सार्थक सामाजिक इतिहास नहीं हो सकता है। हम वास्तव में स्वर्गीय डॉ के एस सिंह के अकादमिक जगत में उनके योगदान के लिए आभारी हैं, विशेष रूप से आदिवासी समाज के विकास लिए।

    विभिन्न आदिवासी समुदायों के निवास वाले क्षेत्रों में उनकी पोस्टिंग के साथ, उन्हें उनके रीति-रिवाजों और संस्कृतियों, विशेष रूप से हो और मुंडा समुदाय के असंख्य लोगों से अवगत कराया गया। उनके जीवन पर इन संस्कृतियों के असाधारण प्रभाव को इस तथ्य से देखा जा सकता है कि उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार मुंडा अनुष्ठानों के अनुसार किया जाए और उनकी राख को खूंटी में तज़ना नदी में विसर्जित किया जाए।

    उन्होंने अपनी थीसिस को 1966 में फ़िरमा के एल मुखोपाध्याय, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित ‘द डस्ट स्टॉर्म एंड द हैंगिंग मिस्ट: ए स्टडी ऑफ़ बिरसा मुंडा एंड हिज़ मूवमेंट इन छोटानागपुर 1874-1901’ नामक पुस्तक में परिवर्तित कर दिया। यह धार्मिक और उनके जीवन के संघर्ष और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक आंदोलन, आदिवासियों के बीच राष्ट्रवाद की भावना को बोते हैं। एक बड़े दृष्टिकोण से, बिरसा आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के साथ एक ब्रिटिश विरोधी विश्वास साझा किया। यह पुनर्जागरण की भारतीय भावना और गरिमा और आत्म-सम्मान के लिए सुधार के साथ भी प्रतिध्वनित हुआ।

    उनकी भारतीय प्रशासनिक अधिकारी (आईएएस) यात्रा:
    उन्होंने 1958 में भारतीय प्रशासनिक अधिकारी (IAS) के तौर पर बिहार राज्य कैडर को चुना। 1959 में सहायक बंदोबस्त अधिकारी के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग सिंहभूम में हुई थी। यह एक ‘हो’ आदिवासी समुदाय के साथ उनका पहला साक्षात्कार था। इससे उन्हें कृषि व्यवस्था और सामाजिक संरचना का अध्ययन करने का अवसर मिला। उन्होंने हो भाषा सीखी और 100 गांवों का सर्वेक्षण किया। इस अध्ययन को उन्होंने गाँव से प्राप्त नोट्स (जानकारी) में बदल दिया। उन्होंने खूंटी में उप-मंडल अधिकारी के रूप में काम किया, जो मुख्य रूप से मुंडा क्षेत्र था। उन्होंने मुंडारी भाषा सीखी और आदिवासी दावतों और त्योहारों में भाग लिया। इन प्रदर्शनों ने उन्हें जनजातीय विश्वदृष्टि का समग्र दृष्टिकोण प्रदान किया।

    डॉ सिंह ने 1965-1968 के दौरान पलामू के उपायुक्त के रूप में काम किया, जब सूखा पड़ा था। उन्होंने 1967 के अकाल से सफलतापूर्वक मुकाबला किया। वह फरवरी 1978 से जून 1980 के दौरान दक्षिण छोटानागपुर मंडल के संभागीय आयुक्त थे। उन्होंने 1980 में एक छोटी अवधि के लिए रांची विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्य किया। वह उन बुद्धिजीवियों में से एक थे जिन्हें लोग याद रखेंगे। एक भारतीय विद्वान-प्रशासक के रूप में। उनके अधिकांश प्रकाशनों में नृविज्ञान और शिक्षाविदों के क्षेत्र में सांस्कृतिक, जैविक और भाषाविज्ञान आयामों को शामिल किया गया है।

    डॉ सिंह की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार मुंडारी रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाए और उनकी अस्थियों को खूंटी में तज़ना नदी में विसर्जित किया जाए। डॉ सिंह ने अपने करियर की शुरुआत खूंटी से आईएएस के रूप में की थी। यह उनका कर्मक्षेत्र था, जहां वे बिरसा मुंडा के साथ विसर्जित हुए थे। डॉ सिंह के परिवार ने दिल्ली से खूंटी तक उनकी अंतिम यात्रा का आयोजन किया और उनकी अंतिम इच्छा तज़ना के तट पर उनके दोस्तों और शुभचिंतकों की उपस्थिति में की गई।

    उनके प्रकाशन और पुरस्कार:
    (1) पुस्तकें लिखी गईं – 11; (2) पीपल ऑफ इंडिया सीरीज लेखक/सह-लेखक के रूप में – 12; (3) ‘पीपल ऑफ इंडिया’ श्रृंखला के सामान्य संपादक के रूप में – 43; (4) संपादित पुस्तकों में प्रकाशित लेख – 61; (5) पत्रिकाओं में लेख – 68; (6) पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षा – 42; (7) संपादित पुस्तकें- 14; और (8) पुरस्कार और विशिष्टता – 09।

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