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    Home»Offbeat»हीट वेव से पक्षी भी हलकान, 500 से अधिक बैट्स की गई जान
    Offbeat

    हीट वेव से पक्षी भी हलकान, 500 से अधिक बैट्स की गई जान

    Offbeat NewsBy Offbeat NewsMay 29, 2024
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    पदमा (हजारीबाग), सजल पाठक। पिछले दो दिनों के सहसा बढ़े तापमान का असर देखना है, तो जाइए हजारीबाग के पदमा स्थित सरैया की पाठक टोली। पिछले दो दिनों में यहां 500 से अधिक चमगादड़ों (बैट्स) ने अपने प्राण गंवा दिए हैं। पेड़ से टपकते किसी पके आम की भांति चमगादड़ों की जान हताहत हो रही है। पहले तो ग्रामीणों को यह लगा कि कहीं कोई वायरस तो नहीं फैल गया। फिर वहां पानी लाया गया, तो पीने के बाद मूर्छित चमगादड़ों में जान आयी। हालांकि इसके पहले ही सैकड़ों चमगादड़ों की मौत हो चुकी थी। 

    एक्सपर्ट्स व्यू : विनोबा भावे विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान के प्रोफेसर डा. बीके गुप्ता ने बताया कि अचानक बढ़े तापमान और पानी की कमी से चमगादड़ों की मौत हो रही है। उन्हें बचाना है, तो आसपास पानी की व्यवस्था करनी होगी।

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    पक्षी विशेषज्ञ डा. सत्यप्रकाश ने बताया कि अचानक बढ़े तापमान से चमगादड़ों में डिहाइड्रेशन होने की वजह से उनकी मौत हो रही है। प्रकृति के क्षरण का सीधा दुष्परिणाम देखने को मिल रहा है। जंगल कटने से बारिश की कमी हुई और पानी नहीं मिलने से जीव-जंतु हलकान हैं और उनकी जान जा रही है।

    जंतु विज्ञान के जानकार मृत्युंजय पाठक कहते हैं कि चमगादड़ों की अचानक सामूहिक मृत्यु के कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

    रोग और संक्रमण : चमगादड़ों में वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण जैसे कि रैबीज, हेंड्रा वायरस या निपाह वायरस हो सकते हैं, जो उनकी सामूहिक मृत्यु का कारण बन सकते हैं।

    पर्यावरणीय विषाक्तता: कीटनाशकों, रासायनिक उर्वरकों या अन्य प्रदूषकों की उच्च मात्रा से भी चमगादड़ों की मृत्यु हो सकती है। प्रदूषित पानी या भोजन इनका प्रमुख कारण हो सकता है।

    प्राकृतिक आपदाएं:  तूफान, बाढ़ या अत्यधिक गर्मी जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी चमगादड़ों की सामूहिक मृत्यु का कारण बन सकती हैं।

    मानव गतिविधियां: वनों की कटाई, अत्यधिक शोर  और चमगादड़ों के आवास में हस्तक्षेप जैसे मानव गतिविधियों के कारण भी उनकी मृत्यु हो सकती है।

    कीटनाशक का प्रभाव: चमगादड़ अक्सर कीटनाशकों के संपर्क में आ जाते हैं, जब वे कीड़े खाते हैं।  ये कीटनाशक चमगादड़ों के लिए विषैले हो सकते हैं और उनकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं।

    जलवायु परिवर्तन: जलवायु में बदलाव  जैसे तापमान में अत्यधिक वृद्धि या कमी भी चमगादड़ों की जीवनशैली पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

    इन संभावित कारणों की पुष्टि के लिए स्थानीय वन्यजीव अधिकारियों, पशु चिकित्सकों और पर्यावरण वैज्ञानिकों की टीम द्वारा जांच की जानी चाहिए। इस तरह की घटनाओं की सही वजह का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण और अनुसंधान आवश्यक हैं।

    फिलहाल भीषण गर्मी ही चमगादड़ों की मौत की वजह

    भीषण गर्मी के बीच प्रदेश के कई शहरों से भी बड़ी संख्या में चमगादड़ों की मरने की खबर सामने आ रही है। इस बिच हज़ारीबाग जिले के पदमा प्रखंड मे भी चमगादड़ों के मरने का सिलसिला शुरू हो गया।

    दरअसल पदमा प्रखंड के सरैया पाठक टोला स्थित दर्जनों पेड़ों पर बड़ी संख्या में चमगादड़ का आश्रय स्थल है। परन्तु कुछ दिनों से यहां ऐसे हालात हो गए हैं कि पेड़ों पर लटके चमगादड़ पके आम की तरह टपक रहे हैं। और इनकी मौत हो जा रही है। 

    अभी तक यहां पांच सौ से भी अधिक चमगादड़ों की मौत हो चुकी है। यह सिलसिला पिछले दो दिनों से चल रहा है। पर्यावरण के जानकारों के अनुसार पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और नदियों मे पानी नहीं रहने के वजह से शाम और रात भी गर्म रहने लगी है।

    इससे पक्षियों के आश्रय स्थल मे कमी और तापमान में बढ़ोतरी हो गई। इसी वजह से पक्षियों की मौत हो रही है। वहीं अत्यधिक गर्मी में पक्षियों को दाना-पानी भी नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि इस भीषण गर्मी का असर पशु से अधिक चमगादड़ व अन्य पक्षियों पर देखा जा रहा है। इधर पदमा में चमगादड़ों के मरने की विचित्र घटना से हर कोई हैरान है।

    चमगादड़ों की बढ़ती मौतें : अदृश्य संकट

    पिछले कुछ वर्षों में आकाश और जंगलों में खामोश चिंताजनक संकट पैदा हो रहा है। चमगादड़ों की बढ़ती मौतें। ये रहस्यमय प्राणी जिन्हें अक्सर गलत समझा जाता है और नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन  यह जीव पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी तेजी से घटती संख्या, मानव गतिविधियों और पर्यावरणीय परिवर्तनों के संयोजन से प्रेरित, तत्काल ध्यान रखने की आवश्यक है।

    अदृश्य खतरा

    जानकरी के अनुसार चमगादड़ों को कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है। इसमें से एक निवास स्थान का विनाश होना है। इनमें कृषि, शहरी विकास और खनन कार्यों के लिए वनों की कटाई के कारण आवास और चारे के क्षेत्रों का नुकसान भी शामिल है।  चमगादड़ इन प्राकृतिक स्थानों पर आश्रय और भोजन के लिए निर्भर रहते हैं। जैसे-जैसे उनके आवास सिकुड़ते जाते हैं, चमगादड़ मानव के करीब आने को मजबूर हो जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ जाता है और उनकी आबादी और भी खतरे में पड़ जाती है। जलवायु परिवर्तन इन समस्याओं को और बढ़ा देता है, पारिस्थितिक तंत्र को बदल देता है और कीड़ों की उपलब्धता को प्रभावित करता है, जिन पर कई चमगादड़ प्रजातियां भोजन के लिए निर्भर रहती हैं। गर्म तापमान भी हाइबरनेशन चक्र और प्रवासन पैटर्न को बाधित कर सकता है, जिससे  मृत्यु दर बढ़ जाती है।

    पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

    चमगादड़ों की घटती आबादी के पारिस्थितिक प्रभाव बहुत दूरगामी हैं। चमगादड़ महत्वपूर्ण परागणकर्ता और बीज फैलाने वाले होते हैं, विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में। वे कई पौधों की प्रजनन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिनमें कुछ पौधे शामिल हैं जिन पर मनुष्य भोजन और औषधि के लिए निर्भर रहते हैं। इसके अतिरिक्त कीटनाशक चमगादड़ प्राकृतिक कीट नियंत्रण प्रदान करते हैं, कृषि कीटों सहित बड़ी मात्रा में कीड़े खाते हैं। उनकी अनुपस्थिति के कारण रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग में वृद्धि हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, चमगादड़ अपने मल के माध्यम से पोषक चक्रण और मिट्टी की उर्वरता में योगदान करते हैं, जो एक मूल्यवान उर्वरक है। चमगादड़ों की आबादी का नुकसान इन प्रक्रियाओं को बाधित करता है, जिससे संभावित रूप से पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण और कृषि उत्पादकता में कमी हो सकती है।

    इनके लिए क्या करना चाहिए

    बढ़ती चमगादड़ों की मौतों को कम करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। संरक्षण प्रयासों को प्राकृतिक आवासों की रक्षा और पुनर्स्थापना को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसमें जंगलों का संरक्षण, प्राकृतिक जल स्रोतों को बनाए रखना और विस्थापित चमगादड़ आबादी का समर्थन करने के लिए कृत्रिम आश्रय स्थलों का निर्माण शामिल है। जलवायु कार्रवाई अनिवार्य है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए रणनीतियों को लागू करना उन पारिस्थितिक तंत्रों को संरक्षित करने में मदद करेगा जिन पर चमगादड़ निर्भर हैं। इन रात के मौन रक्षकों की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।

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