
हजारीबाग, डॉ. अमरनाथ पाठक। प्रोफेसर डाॅ सादिक रज्जाक के कार्यकाल पूरा होने के बाद विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग में ऐसे व्यक्ति को प्रभारी कुलसचिव को कुर्सी पर आसीन कर दिया था, जिन्हें कर्तव्य और दायित्व का कुछ भी बोध नहीं था। लोकभवन से पत्र आने के 24 घंटे पहले की बात है।
मैं शिक्षा मंत्री सुदिव्य सोनू और कुछ अन्य मामलों की रूटीन खबरों की जानकारी लेने रजिस्ट्रार कुमार विकास के पास गया था। वह बड़े ही बेअदबी से पेश आए थे और कहा कि मैं आपको क्या-क्या बताऊं और क्यों बताऊं। तो मैंने कहा था कि आपको जानकारी देने के लिए यहां बैठाया गया है। फिर उन्होंने कहा था कि जाइए यहां से…तो मैंने कहा था कि मैं बैठने आया भी नहीं हूं। लेकिन आप कितनी देर बैठेंगे…। शायद वह कुमार विकास नहीं, उनकी रजिस्ट्रार की कुर्सी का गुमान बोल रहा था। वह भी तब, जब वह प्रभारी थे। अच्छा हुआ हटा दिए गए…। मैं कोई निजहित के लिए नहीं गया था, मैं तो जनहित की खबरों के लिए गया था। मेरा यही पेशा है। सादिक रज्जाक साहब भी प्रभारी रजिस्ट्रार रहे। कई बार काम से गया, उनके रत्तीभर आचरण ने कभी आहत नहीं किया।
मैं यह वाक्या इसलिए नहीं लिख रहा कि कुमार विकास से मेरी कोई जातीय दुश्मनी है…सिर्फ इसलिए लिख रहा हूं कि विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग के कुलपति प्रोफेसर चन्द्र भूषण शर्मा ने सदैव मेरा स्वागत किया। लेकिन रजिस्ट्रार ने जो आचरण किया, वैसे कुछ मनचले शख्स के कारण ही विश्वविद्यालय सवालों के घेरे में रहता है।

रजिस्ट्रार व्यस्त होते हैं, लेकिन व्यस्त होना और खुद को व्यस्त दिखाना, दोनों में गहरा फर्क है। व्यस्त तो मैं भी हूं, 12 पेज का हर दिन अखबार निकालता हूं। कोशिश रहती है कि शाब्दिक त्रुटि न रहे। देश-दुनिया की खबरों से वाकिफ कराता हूं। हर दिन मेरे लिए एक अलग चुनौती है। उन चुनौतियों को पिछले 28 वर्षों से स्वीकार करता रहा हूं।
बहुत कुछ सुनता हूं, लेकिन अपना आचरण क्यों खराब करूं। हर के प्रति सम्मान, स्नेह और आदर का भाव रखता हूं। बड़े-बड़े अखबारों में बड़े ओहदों पर रहा, आज भी हूं, इंटरनेशनल अवार्डी रहा, लेकिन गुमान नहीं पाला। आज भी सकारात्मक खबरों पर जोर देता हूं, खबरों से किसी को व्यक्तिगत आहत नहीं करने का भरसक प्रयास रहता है। लोगों की मदद के लिए प्रयासरत रहता हूं।
हमें कलम की ताकत बुराइयों के दमन के लिए दिखाना है। आप खुद ही सोचिए अगर कुमार विकास जैसे अव्यावहारिक लोग रजिस्ट्रार रह जाते, तो न जाने कितने लोगों का बेड़ा गर्क हो जाता और कितने काम ठहर जाते। मैं तो बस इतना जानता हूं कि गुमान सबको सम्मान देने में हो, गुमान सबसे शिष्ट आचरण करने में हो, गुमान जरूरतमंदों की मदद करने में हो… बहरहाल यह जानकारी हो कि रजिस्ट्रार बने कुमार विकास और वित्त पदाधिकारी बनाए गए सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा को वापस पैतृक विभाग में भेज दिया गया है। अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि….क्योंकि मैं अपना दायरा जानता हूं और सभी को खुद से श्रेष्ठ मानता हूं….सादर धन्यवाद!
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