
बलरामपुर, विष्णु पांडेय। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में त्योहारों की तैयारी के साथ कुम्हार परिवारों के घरों में मिट्टी के चाक भी तेजी से घूमने लगे हैं। पीढ़ियों से चली आ रही माटी की कला को यहां के कुम्हार आज भी जीवित रखे हुए हैं। हाथों से मिट्टी को आकार देकर दीये, कलश, ढक्कन और चुकला जैसी चीजें तैयार की जा रही हैं। नवरात्र और दीपावली नजदीक आने के साथ मिट्टी के दीये और कलश की मांग भी बढ़ गई है।
रामानुजगंज के कई कुम्हार परिवारों के लिए यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि परिवार चलाने का मुख्य साधन भी है। सुबह से शाम तक चाक पर मिट्टी को आकार देने का काम चलता है। तैयार सामान को धूप में सुखाया जाता है और फिर पकाकर बाजार में बिक्री के लिए भेजा जाता है। हालांकि इस पारंपरिक काम के सामने बदलते समय के साथ कई चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं।
चाक पर घूमती मिट्टी में आज भी जिंदा है पुरखों की कला
रामानुजगंज के कुम्हार चिकनी मिट्टी से अलग-अलग तरह के बर्तन और पूजा सामग्री तैयार करते हैं। सीमेंट से बने पारंपरिक चाक को हाथ से घुमाकर मिट्टी को आकार दिया जाता है। इसी चाक पर कभी मटके, घड़े, कड़ाही, खपड़े और घरेलू उपयोग की कई दूसरी चीजें तैयार होती थीं। समय के साथ बाजार में प्लास्टिक, सीमेंट और दूसरे आधुनिक सामानों का चलन बढ़ा तो मिट्टी के सामान की मांग कई चीजों के लिए कम हो गई।
इसके बावजूद दीये और पूजा से जुड़ी मिट्टी की सामग्री की मांग आज भी बनी हुई है। नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान कुम्हार परिवारों के काम में तेजी आ जाती है। इस समय वे बड़ी संख्या में दीये और कलश तैयार करने में जुटे हैं।
खपड़ैल के घरों की ठंडक अब यादों में
एक समय रामानुजगंज और आसपास के गांवों में मिट्टी के खपड़ैल से बने घर आम थे। गर्मी के मौसम में इन घरों के अंदर अपेक्षाकृत ठंडक रहती थी। कुम्हार परिवार खपड़ैल बनाकर भी अपनी आजीविका चलाते थे। लेकिन समय के साथ पक्के मकानों और सीमेंट की चादरों का चलन बढ़ता गया। इसके कारण मिट्टी के खपड़ैल की मांग लगभग खत्म हो गई।
अब गांवों में कहीं-कहीं पुराने खपड़ैल वाले मकान ही दिखाई देते हैं। कुम्हारों का कहना है कि खपड़ैल का काम लगभग बंद हो चुका है और उनका व्यवसाय अब मुख्य रूप से दीये, कलश और दूसरी छोटी मिट्टी की वस्तुओं तक सीमित रह गया है।
इलेक्ट्रॉनिक चाक मिले तो आसान होगा काम
रामानुजगंज के वार्ड क्रमांक एक निवासी कुम्हार संतोष प्रजापति बताते हैं कि उनके पूर्वज भी मिट्टी के सामान बनाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। आज उनकी अगली पीढ़ी भी इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है। वे दशहरा और दीपावली के लिए दीये, ढक्कन और चुकला बनाने के साथ शादी विवाह के लिए कलश और ढक्कन भी तैयार करते हैं।
संतोष प्रजापति का कहना है कि पारंपरिक चाक पर काम करना काफी मेहनत वाला है। लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर चाक चलाना पड़ता है। सीमेंट का चाक भारी होता है और उसे हाथ से घुमाना पड़ता है। अगर शासन की ओर से इलेक्ट्रॉनिक चाक उपलब्ध कराया जाए तो काम आसान हो सकता है और कम समय में अधिक सामान तैयार किया जा सकेगा। उन्होंने शासन से इलेक्ट्रॉनिक चाक उपलब्ध कराने की मांग की है।
मिट्टी की व्यवस्था भी बड़ी चुनौती
वार्ड क्रमांक एक निवासी बालकेश्वर प्रजापति माटी कला बोर्ड के ब्लॉक अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने बताया कि कुम्हारों के सामने मिट्टी की उपलब्धता भी बड़ी समस्या है। दीये और दूसरे सामान बनाने के लिए चिकनी मिट्टी की जरूरत होती है, जिसे उन्हें खरीदना पड़ता है।
उनका कहना है कि रामानुजगंज में इलेक्ट्रॉनिक चाक भी बहुत कम कुम्हारों को मिला है। इससे कई कुम्हार अभी भी पारंपरिक चाक पर ही निर्भर हैं। इस संबंध में शासन को आवेदन भी दिया गया है। उन्होंने कुम्हार परिवारों के लिए मिट्टी उपलब्ध कराने के लिए जमीन की व्यवस्था करने की मांग की है, ताकि माटी की यह पारंपरिक कला आगे भी जीवित रह सके।
बारिश ने बढ़ाई परेशानी, धूप नहीं मिलने से धीमा हुआ काम
इस समय बारिश के कारण कुम्हारों के सामने एक और परेशानी खड़ी हो गई है। मिट्टी से तैयार किए गए दीये, कलश और दूसरे सामान को अच्छी तरह सुखाने के लिए पर्याप्त धूप की जरूरत होती है। लगातार बारिश और धूप कम निकलने के कारण सामान सूखने में अधिक समय लग रहा है। इससे उत्पादन की गति भी प्रभावित हो रही है।
इसके बावजूद कुम्हार परिवार त्योहारों की मांग को पूरा करने में जुटे हैं। चाक पर घूमती मिट्टी के साथ वे सिर्फ दीये और कलश नहीं बना रहे, बल्कि अपने पुरखों से मिली उस कला को भी आगे बढ़ा रहे हैं, जो बदलते दौर में धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक चाक, मिट्टी की उपलब्धता और बाजार की बेहतर व्यवस्था जैसी सुविधाएं मिलें तो इस पारंपरिक कला से जुड़े परिवारों के लिए इस काम को आगे बढ़ाना आसान हो सकता है।
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