
बलरामपुर, विष्णु पांडेय। भगवान शिव को सावन का महीना अत्यंत प्रिय माना जाता है। यही वजह है कि सावन शुरू होते ही जिले के छोटे-बड़े सभी शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है। महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सुबह से ही कतार में लगकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इसी आस्था और परंपरा के बीच बलरामपुर जिले में एक ऐसा शिवालय भी है, जो अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति और धार्मिक मान्यताओं के कारण लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
यह शिवालय रामानुजगंज से करीब दो किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत लुर्गी में कन्हर नदी के तट पर स्थित है। इसे जलकेश्वर नाथ शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की खासियत यह है कि यहां दो स्थानों पर शिवलिंग स्थापित हैं। नदी के बिल्कुल करीब नीचे की ओर स्थित शिवालय बरसात के मौसम में कन्हर नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ पानी में डूब जाता है। वहीं, इसके ऊपर स्थित दूसरे शिवालय में श्रद्धालु इस दौरान भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं।
चार महीने जलमग्न रहता है शिवालय
कन्हर नदी का जलस्तर बारिश के दिनों में बढ़ जाता है। ऐसे में नदी के किनारे सबसे नीचे स्थित जलकेश्वर नाथ मंदिर और वहां स्थापित शिवलिंग पानी में डूब जाता है। यह स्थिति करीब चार महीने तक बनी रहती है। नदी का पानी कम होने के बाद शिवलिंग दोबारा श्रद्धालुओं के दर्शन और पूजा के लिए दिखाई देने लगता है।
स्थानीय लोगों के लिए मंदिर का पानी में डूबना किसी सामान्य प्राकृतिक घटना से कहीं अधिक आस्था का विषय है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि कन्हर नदी गंगा के समान पवित्र है और बरसात के चार महीनों में मां गंगा स्वयं जलकेश्वर नाथ का जलाभिषेक करती हैं। यही धार्मिक मान्यता इस स्थान को क्षेत्र के दूसरे शिवालयों से अलग पहचान देती है।
कन्हर नदी के उस पार झारखंड
जलकेश्वर नाथ मंदिर की एक और खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति है। कन्हर नदी के एक किनारे छत्तीसगढ़ का रामानुजगंज क्षेत्र है, जबकि नदी के उस पार झारखंड की सीमा शुरू होती है। यही वजह है कि इस शिवालय में केवल स्थानीय श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
महाशिवरात्रि के दौरान जब नदी का जलस्तर जब कम होता है और नीचे स्थित शिवालय तक पहुंच संभव होती है, तब यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। लोग भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।
गंगा से जुड़ी है धार्मिक आस्था
स्थानीय लोगों के अनुसार, कन्हर नदी को उत्तरवाहिनी और गंगा के समान पवित्र माना जाता है। कन्हर नदी का उद्गम जशपुर जिले के क्षेत्र से माना जाता है और आगे चलकर यह सोन नदी में मिलती है। सोन नदी का आगे गंगा नदी से संगम होता है। इसी धार्मिक और भौगोलिक संबंध के कारण स्थानीय लोगों में कन्हर नदी के प्रति गहरी आस्था है।
इसी आस्था के चलते जलकेश्वर नाथ मंदिर में नदी के पानी से होने वाले प्राकृतिक जलाभिषेक को श्रद्धालु विशेष धार्मिक घटना के रूप में देखते हैं। जब मंदिर पानी में डूबा रहता है, तब भी पूजा की परंपरा बंद नहीं होती। श्रद्धालु ऊपर स्थित शिवलिंग के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं।
ग्रामीणों की गहरी आस्था
स्थानीय निवासी और शिवभक्त रमेश कुमार बताते हैं कि लुर्गी गांव में कन्हर नदी के किनारे भगवान शिव का घाट और मंदिर स्थित है। सावन और शिवरात्रि के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग यहां पूजा करने पहुंचते हैं। उनके अनुसार कन्हर नदी के किनारे स्थित इस शिवालय की आसपास के गांवों में काफी मान्यता है। ग्रामीण नियमित रूप से यहां आकर भगवान शिव की पूजा करते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।
श्रद्धालु मीणा कुमारी भी जलकेश्वर नाथ मंदिर को आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र मानती हैं। उनका कहना है कि गांव और आसपास के क्षेत्र के लोगों की भगवान शिव में गहरी आस्था है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और भगवान शिव से परिवार की सुख-शांति तथा मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।
प्रकृति और आस्था का अनोखा संगम
जलकेश्वर नाथ शिव मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां प्रकृति और आस्था एक साथ दिखाई देती हैं। बरसात में कन्हर नदी का बढ़ता जलस्तर मंदिर को अपने भीतर समेट लेता है और पानी कम होने पर वही शिवालय फिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए सामने आ जाता है। स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यता ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को भगवान शिव के जलाभिषेक से जोड़ दिया है।
रामानुजगंज से कुछ ही दूरी पर स्थित यह शिवालय क्षेत्र की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सावन में जब जिले के दूसरे शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, उसी समय जलकेश्वर नाथ मंदिर की कहानी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। कन्हर नदी, दो शिवालय और चार महीने तक पानी में डूबा रहने वाला शिवलिंग इस स्थान को आस्था, प्रकृति और रहस्य का अनोखा संगम बनाते हैं।
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