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    Home»Offbeat»मंदिरों में क्लॉकवाइज क्यों लगाते हैं प्रदक्षिणा? जानें क्या कहता है अध्यात्म और विज्ञान
    Offbeat

    मंदिरों में क्लॉकवाइज क्यों लगाते हैं प्रदक्षिणा? जानें क्या कहता है अध्यात्म और विज्ञान

    Offbeat NewsBy Offbeat NewsApril 5, 2026
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    नई दिल्ली। मंदिरों में घड़ी की सुई की दिशा में यानी क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा या परिक्रमा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसे सिर्फ धार्मिक रीति नहीं बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मंदिर का गर्भगृह एक शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र होता है।

    मंदिर में क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा करना केवल रिवाज नहीं है बल्कि यह पृथ्वी की प्राकृतिक ऊर्जा दिशा के साथ तालमेल बिठाने का वैज्ञानिक तरीका है। सही तरीके से की गई प्रदक्षिणा व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाती है। क्लॉकवाइज परिक्रमा करने से व्यक्ति को शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। क्लॉकवाइज परिक्रमा करने से ब्रह्मांडीय ऊर्जा शरीर में आसानी से आत्मसात हो जाती है, जिससे मानसिक शांति, शारीरिक स्फूर्ति और आत्मिक विकास होता है।

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    क्लॉकवाइज परिक्रमा के पीछे वैज्ञानिक सिद्धांत भी है। इस बारे में ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सदगुरु जगदीश वासुदेव भी इस विषय में विस्तार से जानकारी देते हैं। उत्तरी गोलार्ध में प्रदक्षिणा घड़ी की सुई की दिशा में ही की जाती है क्योंकि यह पृथ्वी की प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के अनुकूल है। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब हम नल की टोंटी खोलते हैं तो पानी उत्तरी गोलार्ध में हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में घूमकर बाहर निकलता है। अगर हम दक्षिणी गोलार्ध में जाएं तो पानी उल्टी दिशा में घूमेगा। इसी तरह पूरा ऊर्जा तंत्र काम करता है। जब कोई शक्ति स्थान (मंदिर) हो, तो उसकी ऊर्जा को सही तरीके से ग्रहण करने के लिए क्लॉकवाइज परिक्रमा करनी चाहिए। सदगुरु बताते हैं कि इससे शरीर ऊर्जा को बेहतर तरीके से सोख पाता है।

    धर्म शास्त्रों के अनुसार, परिक्रमा के दौरान अगर बाल गीले हों तो ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है। इससे भी बेहतर है कि पूरे कपड़े गीले हों। सबसे अधिक लाभ तब मिलता है जब व्यक्ति गीले कपड़ों में परिक्रमा करता है। गीले कपड़े शरीर को लंबे समय तक नम रखते हैं, जिससे ऊर्जा का अवशोषण बेहतर होता है। गीले कपड़ों में करना अधिक व्यावहारिक और बेहतर है क्योंकि शरीर जल्दी सूख जाता है।

    आप ध्यान दें तो हर मंदिर में एक जल कुंड या कुआं जरूर होता है, जिसे कल्याणजी भी कहा जाता है। परंपरा थी कि पहले कल्याणी में स्नान कर गीले कपड़ों में ही मंदिर की प्रदक्षिणा की जाती थी। इससे मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा को सबसे अच्छे तरीके से ग्रहण किया जा सकता था। आजकल ज्यादातर कल्याणी सूख चुकी हैं या गंदी हो गई हैं, जिसके कारण यह परंपरा कम हो गई है।

    मंदिरों में विभिन्न देवताओं की परिक्रमा संख्या भी अलग-अलग तय है। धर्मशास्त्र के अनुसार, गणेश जी की तीन बार, विष्णु जी की चार बार, देवी दुर्गा की एक बार और भगवान शिव की आधी परिक्रमा या जलधारी तक करने की परंपरा है। यह नियम ऊर्जा संतुलन और भक्ति के अनुसार बनाए गए हैं।

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