
नई दिल्ली, एजेंसी। Somnath Temple History भारत की उस अमर चेतना की कहानी है, जिसने आक्रमण, विध्वंस और अपमान के बाद भी कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। गुजरात के प्रभास क्षेत्र में स्थित सोमनाथ मंदिर पर 1026 ईस्वी में हुए आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने पर वर्ष 2026 में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व केवल स्मरण नहीं, बल्कि भारतीय आत्मगौरव का उद्घोष है।
Somnath Temple History : प्रथम ज्योतिर्लिंग, जो भारत की आत्मा का प्रतीक है
सोमनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, वेदों, पुराणों और सनातन परंपरा की जीवंत धरोहर है। Somnath Temple History बताती है कि यह मंदिर आस्था से अधिक आत्मबल का प्रतीक रहा है।

चंद्रदेव और शिवलिंग की दिव्य स्थापना कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्त होने के लिए उन्होंने प्रभास क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें श्रापमुक्त किया और अपने मस्तक पर स्थान दिया। इसी कारण इस स्थल को सोमनाथ यानी “सोम के स्वामी” कहा गया।
श्राप, तपस्या और अमर आशीर्वाद की गाथा
चंद्रदेव ने अपनी 27 पत्नियों में रोहिणी को विशेष प्रेम दिया, जिससे दक्ष प्रजापति क्रोधित हो गए और उन्हें क्षय रोग का श्राप दे दिया। Somnath Temple History में यह प्रसंग बताता है कि कैसे शिव आराधना ने चंद्र को पुनः तेजस्वी बनाया और अमर किया।

हवा में स्थित शिवलिंग: आस्था या विज्ञान?
लोककथाओं में वर्णन मिलता है कि प्राचीन सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग बिना किसी भौतिक सहारे के स्थित था। इसे चुंबकीय तकनीक से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि जब आक्रमणकारी मंदिर में पहुंचे, तो यह दृश्य देखकर वे स्तब्ध रह गए। यह प्रसंग आज भी Somnath Temple History का सबसे रहस्यमय अध्याय माना जाता है।

विध्वंस के बाद भी जीवित रहा विश्वास
इतिहास साक्षी है कि इस मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए, उसे तोड़ा गया, लूटा गया, लेकिन हर बार भारत की चेतना ने इसे फिर से खड़ा किया। सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारतीय समाज के अदम्य साहस का प्रमाण है।
स्वर्ण, रजत, चंदन और पत्थर का मंदिर
मान्यता है कि पहले चंद्रदेव ने इसे सोने से बनवाया, सूर्यदेव ने चांदी से, भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन से और बाद में सोलंकी राजपूतों ने इसे पत्थर की भव्यता दी। Somnath Temple History में यह क्रम भारतीय संस्कृति की निरंतरता दर्शाता है।

आदिकाल से चला आ रहा आस्था का केंद्र
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, स्कंद पुराण के प्रभास खंड में इस मंदिर की स्थापना को करोड़ों वर्ष पुराना बताया गया है। यह इसे केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि कालातीत बनाता है। मंदिर के दक्षिणी तट पर स्थित बाण स्तंभ आज भी कौतूहल का विषय है। इस पर अंकित वाक्य दर्शाता है कि यहां से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई अवरोध नहीं है। यह Somnath Temple History का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संगम है।
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