
बलरामपुर, विष्णु पांडेय। बसंत पंचमी की दस्तक के साथ ही बलरामपुर जिले में श्रद्धा, आस्था और रचनात्मकता का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। 23 जनवरी को मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर बाजारों से लेकर मोहल्लों तक खासा उत्साह है। खासकर मां सरस्वती की प्रतिमाओं को लेकर मूर्तिकारों के यहां अभूतपूर्व चहल-पहल है, जो इस बार पिछले वर्षों के मुकाबले कहीं अधिक दिखाई दे रही है।
बलरामपुर जिले में बसंत पंचमी को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा के लिए लोगों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। इसका सीधा असर मूर्ति बाजार पर पड़ा है, जहां इस बार प्रतिमाओं की मांग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मूर्तिकारों के अनुसार, बीते सालों की तुलना में इस बार अधिक ऑर्डर मिले हैं और अधिकांश प्रतिमाएं पहले से ही बुक हो चुकी हैं।
मूर्तिकारों ने इस बार पारंपरिक और आकर्षक डिजाइनों पर विशेष ध्यान दिया है। अलग-अलग आकार और शिल्प में तैयार की गई प्रतिमाएं एक हजार रुपये से लेकर छह हजार रुपये तक उपलब्ध हैं। ग्राहक अपनी सुविधा और बजट के अनुसार प्रतिमा का चयन कर रहे हैं, लेकिन अधिकतर लोग पारंपरिक शैली की मूर्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सरस्वती पूजा को लेकर बच्चों और युवाओं में खासा जोश नजर आ रहा है। रामानुजगंज क्षेत्र में बच्चों ने अपने-अपने मोहल्लों में छोटे-छोटे पूजा पंडाल तैयार किए हैं, जहां 23 जनवरी को विधि-विधान से मां सरस्वती की आराधना की जाएगी। पढ़ाई और रचनात्मकता से जुड़े इस पर्व को लेकर बच्चों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि, बलरामपुर जिला झारखंड की सीमा से सटा हुआ है। हर वर्ष यहां बंगाली समाज से जुड़े कारीगर पूजा के मौसम में पहुंचते हैं और पारंपरिक ढंग से प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। कई मूर्तिकार ऐसे भी हैं, जो सालभर जिले में रहकर दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा और छठ जैसे प्रमुख पर्वों के लिए मूर्तियां तैयार करते हैं।
केरवाशीला गांव के युवा मूर्तिकार प्रीतम सरकार बताते हैं कि बीते करीब दो महीनों से वे सरस्वती माता की प्रतिमाओं के निर्माण में जुटे हुए हैं। उनके पास विभिन्न आकार और डिज़ाइन की मूर्तियां उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत एक हजार से छह हजार रुपये के बीच है।
वहीं, अनुभवी मूर्तिकार प्रताप सरकार का कहना है कि उनका यह पारिवारिक व्यवसाय पीढ़ियों से चला आ रहा है। इस वर्ष उन्होंने सरस्वती पूजा के लिए लगभग 85 प्रतिमाओं का निर्माण किया है। मूर्तियों को आकार देने में लकड़ी, पुआल और मिट्टी का उपयोग किया जाता है, जबकि शुद्धता और परंपरा को बनाए रखने के लिए गंगा की मिट्टी विशेष रूप से कोलकाता से मंगाई जाती है।
कुल मिलाकर, बसंत पंचमी से पहले बलरामपुर में सरस्वती पूजा की तैयारियां अपने चरम पर हैं। आस्था, परंपरा और कला के इस संगम ने पूरे जिले को उत्सव के रंग में रंग दिया है।
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